Monday, March 30, 2009

बरी होते नेता

राजनेताओं पर अगर कोई केस दर्ज किया जाता है, तो कई वर्षो तक उनके खिलाफ मामले की सुनवाई चलती है और किसी न किसी कानूनी छिद्र का लाभ उठाकर वे बरी हो जाते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि चूंकि ये लोग ही नियम- कानून बनाते हैं इसलिए उन्हें तोड़ना वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। नेताओं के खिलाफ चाहे कितने ही सबूत जूटा लिए जाएं, यहां तक की इनके भ्रष्ट कार्यों की वीडियों फिल्म भी तैयार करके अदालत में दिखा दी जाए तो भी इनका कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि ये सिस्टम की कमजोरियों को बखूबी पहचानते है। यही वजह है कि घोटालों में लिप्त होने और उनका पर्दाफाश होने के बावजूद उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती।

पटरी बाज़ार

दुनिया के हर देश में पटरी बाज़ारों की पुरानी परंपरा है, लेकिन हमारे देश की हर सरकार अमुमन इसके विरोध में रही हैं। इन बाजा़रो में हर तबके के लोग खरीदारी करने आते हैं और उन्हें यहां सस्ती चीजें मिलती है, पर आए दिन किसी न किसी बहाने सरकार पटरी बाजा़रों को कभी बंद कर देती है, तो कभी उनकी जगह बदल देती हैं। सरकार का तर्क होता है कि इनके चलते टैफिक अस्त-व्यस्त हो जाता है। परन्तु सचाई यह कि पटरी पर लगने वाली इन दुकानों से भारी राजस्व सरकार के खाते में जाता है और आम लोगों की जरूरत की हर चीज इन बाजा़रो से आसानी से मिल जाती है। इसलिए इनकी जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।

Friday, March 6, 2009

सूचना तंत्र की मज़बूरी का सकारात्मक सरकारी प्रयास

अस्सी के दशक के मध्य तक एक राष्ट्रीय नेटवर्क की स्थापना करने का सरकार ने लक्ष्य बनाया, जिस नेटवर्क के जरिये सभी प्रमुख जिला केंद्रों और प्रदेश की राजधानियों को आपस में जोड़ा जा सके। इसे विकास और प्रशासन से संबंधित सूचनाओं का विशाल आधार बनना था। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए नेशनल इंफोर्मेटिक्स सेंटर ;छप्ब्द्ध की स्थापना की गई। हालांकि इस सेंटर की स्थापना सत्तर के दशक के मध्य में प्रशासन के कंप्यूटरीकरण के लिए हुई थी, लेकिन अस्सी में कृत्रिम उपग्रह से जुड़े हुए निकनेट नामक नेटवर्क के उद्घाटन के बाद ही यह कारगर हो पाया।

आज निकनेट देश का सबसे बड़ा सूचना नेटवर्क है। यह जिलों, राज्यों और राष्ट्र के केंद्रों को आपस में जोड़ता है। इसमें समाजविज्ञानों, चिकित्साविज्ञान और कानून संबंधी आंकड़ों का विशाल भंडार समाया हुआ है। यह नेटवर्क देश के सभी शोध संस्थानों के साथ भी संबंध रखता है। अपने-मेल नेटवर्क पर इन सभी केंद्रों के साथ-साथ निकनेट प्रयोक्ताओं को इंटरनेट और वेब की सुविधाए भी मुहैया कराता है। देश के अन्य राजकीय नेटवर्क एरनेट ;एजुकेशनल एंड रिसर्च कम्युनिकेशन नेटवर्क को भी पीछे छोड़ चुके निकनेट की सार्वजनिक उपस्थिति अब आसानी से देखी जा सकती है। निकनेट का मतलब प्रशासन और शिक्षा के क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा कंप्यूटरों का होना ही नहीं है। वह तो सत्ता की पूरी प्रौधोगिकी को ही बदल देना चाहता है। इसीलिए वह सार्वजनिक मंच पर ख़ुद को बड़े आक्रामक ढंग से पेश करता है। दरअसल, निकनेट अस्सी के दशक के आखिरी वर्षों से ही राजकीय साइबर-समुदाय बनाने की कोशिश में लगा हुआ है। इसके लिए वह जगह-जगह नियमित रूप से नेटवर्किंग, ई-मेल और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आमतौर से सरकारी संगठन इस तरह से काम करते हुए नहीं दिखते। इसी रवैये के कारण निकनेट को उन सरकारी संगठनों के साथ टकराव की स्थितियों का सामना भी करना पड़ता है जो अभी तक पुराने नौकरशाही केंद्रित नियंत्रण के पक्ष में है। निकनेट का संचालन उन लोगों के हाथ में है जो समझ चुके है कि पुराने प्रशासनिक ढर्रे को नया रूप देना पड़ेगा क्योंकि जनता पर निगरानी रखने के पुराने तरीकों की उपयोगिता अब खत्म हो चुकी है।

निजी तौर पर निकनेट के प्रशासक नेटवर्को पर नियंत्रण करने के सभी प्रयासों को अस्वीकार करते है। उन्होंने साधारण नागरिकों के लिए कुछ आकाशीय मार्ग खोलने के लिए सार्वजनिक मुहिम भी चलायी है और अपने कुछ आकाशीय मार्ग खोल कर संचार पर पुराने किस्म की राजकीय पाबंदियों को खत्म करने की मिशाल पेश की है।

Wednesday, February 18, 2009

दुनिया सिर्फ़ आप के सोचने जैसी ही नहीं है ...

कचरे के ढेर में ये अश्वेत गुडिया किसकी है ? बाकि बच्चियाँ तो अपने-अपने घरों में बैठी महँगी गुडियाओं के साथ खेल रही है ।


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हा ! हा ! हा ! .... राख में भोजन ?
ये दो बच्चियाँ नासमझ हैं ...भला इन्हें क्या मालूम कि भोजन तो कल रात को मेरे पड़ोस में हो रही शादी में बची झूठन के ढेर में पड़ा था ।

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पानी तो मुंबई , न्यूयार्क , लन्दन , दुबई और फ्लोरेंस जैसे बड़े - बड़े शहरों में बने बड़े - बड़े स्वीमिंग पूलोंमें बहुत है .........फिर ये खली डब्बों की कतार क्यों भला ?

बच्चे भगवन का रूप होते हैं । ये बच्चे क्या है भला ?