आज जवां रंगों की आजमाइश करने की एक छोटी सी शुरुआत में कर रहा हूँ।
दरअसल यह कोशिश है जानने की कि आख़िर जवां रंग होते कैसे हैं । जवां रंग सोचते क्या हैं। उनके दिमाग में कौनसे मुद्दे तैरते रहते हैं ? अपना देश आज अधिकतर इन्ही लोगों की बहुसंख्या ही तो है।
मेरी आगे ये कोशिश रहेगी की बातों का ऐसा सुखद दौर इस किस्म की बातों से खुशनुमा बना रहे।
आदर्श चांदेकर
Wednesday, October 15, 2008
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